Arabic Quote (अरबी सुविचार): "إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ"
तपती रेत पर चलकर, हम अपना फर्ज निभाते हैं,
सऊदी की गलियों में रहकर, घर का खर्च चलाते हैं।
कभी याद आए वतन की, तो आँखें भर आती हैं,
मगर माँ की दुआएं हमें, हर मुश्किल से बचाती हैं।
हम परदेसी हैं साहब, दर्द छुपाकर मुस्कुराते हैं,
अपने बच्चों के सपनों के लिए, अपनी जवानी लुटाते हैं
ज़रूर पार्टनर! यह रही 20-25 बेहतरीन शायरियाँ जो सऊदी अरब (Saudi Arabia) में रहने वाले हमारे परदेसी भाईयों के दिल को छू लेंगी।
आप इनका एक बड़ा "Collection Post" बना सकते हैं या रोज़ 2-2 शायरी फोटो के साथ डाल सकते हैं। इससे लोग आपकी वेबसाइट पर बार-बार आएंगे।
Topic: परदेसी का दर्द और घर की याद (Pardesi Life Status)
1.
"घर की दीवारों को पक्का करने की चाहत में,
हम खुद ईंट बन गए परदेस की इमारत में।"
🏡💔
2.
"लोग कहते हैं कि हम रियाल (Riyal) कमाते हैं,
कोई ये नहीं देखता कि हम अपनी जवानी गंवाते हैं।"
💸⏳
3.
"सऊदी की धूप में पसीना बहाना आसान नहीं,
मगर घर वालों की मुस्कुराहट से बढ़कर कोई इनाम नहीं।"
☀️😓
4.
"वीज़ा (Visa) लग गया तो सब खुश थे घर पर,
सिर्फ माँ की आँखों में उदासी थी उस दिन सफर पर।"
✈️😢बहुत याद आती है वो शाम की चाय दोस्तों के साथ,
अब तो बस मशीन की तरह काम करते हैं दिन-रात।"
☕🏗️
सबर कर बन्दे, मुसीबत के दिन भी गुज़र जाएंगे,एक दिन हम भी फ्लाइट पकड़ कर अपने वतन जाएंगे।"
✈️🇮🇳🇵🇰
17.
"मक्का और मदीना की ज़मीन पर कदम रखना नसीब है,
ग़म न कर परदेसी, अल्लाह तेरे बहुत करीब है।"
🕋❤️
18.
"हौसला मत हारना, धूप कितनी भी तेज़ हो,
समंदर कभी सूखा नहीं करते, वक्त कितना भी हो।"
🌊💪
19.
"कमाई रोटी की है, पर इज़्ज़त की होनी चाहिए,
सऊदी में हैं तो क्या, नीयत साफ होनी चाहिएकहानी की शुरुआत: घर की मजबूरी
बिलाल 22 साल का एक नौजवान था, जिसके कंधों पर पूरे घर की ज़िम्मेदारी थी। लाहौर के एक छोटे से मोहल्ले में रहने वाला बिलाल हमेशा क्रिकेट खेलने का शौकीन था, लेकिन घर के हालात ने उसके हाथ से बैट-बॉल छीनकर 'पासपोर्ट' थमा दिया।
बाप बूढ़ा हो चुका था और छोटी बहन की शादी सर पर थी। बिलाल ने एक दिन फैसला किया—"अब्बा, अब मैं सऊदी जाऊंगा।" माँ रोई, बाप ने रोका, लेकिन बिलाल जानता था कि घर की छत पक्की करने के लिए उसे अपना वतन छोड़ना ही पड़ेगा।
एयरपोर्ट का वो मंज़र
वो दिन सबसे भारी था। जब बिलाल अल्लामा इकबाल एयरपोर्ट पर खड़ा था, तो उसकी माँ ने उसके माथे को चूमा और कहा, "बेटा, वक़त पर खाना खा लेना और अपना ख्याल रखना।"बिलाल ने अपने आँसू छुपा लिए। वो जानता था कि अगर वो रोया, तो उसका बाप टूट जाएगा। उसने हँसते हुए सबको अलविदा कहा, लेकिन जैसे ही प्लेन ने उड़ान भरी, बिलाल खिड़की की तरफ मुँह करके फूट-फूट कर रोया। उसका बचपन, उसके दोस्त, उसका शहर—सब नीचे छूट गए थे।
सऊदी अरब: हक़ीक़त से सामनासऊदी अरब की ज़मीन पर कदम रखते ही गर्म हवा के थपेड़े ने बिलाल का स्वागत किया। उसे रियाद (Riyadh) में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम मिला था।
शुरुआत के दिन बहुत मुश्किल थे। 50 डिग्री की गर्मी, 12 घंटे की ड्यूटी, और खाने में सिर्फ़ "खुब्ज़" (अरबी रोटी) और दाल। बिलाल जो अपने घर में माँ के हाथ का बना पराठा मांगता था, अब सूखी रोटी खाकर गुज़ारा कर रहा था।
हर रात जब वो अपने तंग कमरे (Gurfah) में 6 अन्य लोगों के साथ सोता, तो उसे अपने घर का आंगन बहुत याद आता।
पहली कमाई और वीडियो कॉल
एक महीना बीत गया। बिलाल के हाथ में पहली तनख्वाह आई—1500 रियाल। उसने अपने लिए एक नया कपड़ा तक नहीं खरीदा, सारे पैसे घर भेज दिए।उसी शाम उसने घर पर वीडियो कॉल किया।
माँ ने पूछा, "बेटा, तू कैसा है? कमज़ोर हो गया है।"
बिलाल ने अपनी फटी हुई एड़ियां और छाले वाले हाथ छुपा लिए और मुस्कुरा कर बोला, "अरे माँ, मैं मज़े में हूँ। यहाँ बहुत आराम है, एसी में काम करता हूँ।"
ये वो झूठ है, जो हर परदेसी बेटा अपने माँ-बाप से बोलता है। ताकि वो परेशान न हों।
कुर्बानी का नाम 'परदेस'
आज बिलाल को सऊदी में 5 साल हो गए हैं। उसकी बहन की शादी हो गई, घर पक्का हो गया, बाप का इलाज हो गया। लेकिन इस सब में बिलाल के बाल सफ़ेद होने लगे हैं।
वो जब भी शीशे में देखता है, तो उसे वो 22 साल का लड़का नहीं दिखता, बल्कि एक ज़िम्मेदार 'आदमी' दिखता है जिसने अपनों के सपनों के लिए अपने सपने रेगिस्तान में दफ़न कर दिए।Mo Saqib raza
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